टेथर्ड कैप ऐसे ढक्कन होते हैं जो बोतल खोलने के बाद भी बोतल से जुड़े रहते हैं। इनका उद्देश्य ढक्कन के अलग से फेंके जाने अथवा कचरे में खो जाने की संभावना कम करना है।
नई दिल्ली (इंडिया सीएसआर): हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से प्लास्टिक पेय बोतलों पर टेथर्ड कैप अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका में उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त करने की मांग की है। कंपनी ने कहा है कि भारत में फिलहाल टेथर्ड कैप के उपयोग को अनिवार्य बनाने वाला कोई कानून, अधिसूचना या बाध्यकारी नियामकीय निर्देश मौजूद नहीं है।
मामला मूल आवेदन संख्या 137/2026 — आकाश रैनिसन बनाम केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) एवं अन्य से जुड़ा है। HUL ने अपने जवाब में कहा कि याचिका में मांगी गई राहत मुख्यतः नीतिगत निर्णय और नियम बनाने का विषय है, जिसका अधिकार केंद्र सरकार के पास है, न कि किसी कंपनी के विरुद्ध पर्यावरणीय उल्लंघन के आधार पर न्यायिक आदेश जारी करने का मामला।
मामले में प्रतिवादी संख्या 2 HUL ने स्वयं को पक्षकारों की सूची से हटाने की भी मांग की है। कंपनी ने यह जवाब NGT के 20 फरवरी 2026 के उस आदेश के अनुपालन में दाखिल किया है, जिसमें सभी प्रतिवादियों को अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया था।
यह मामला भारत की प्लास्टिक कचरा नीति के एक महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है—क्या बोतल से जुड़े रहने वाले ढक्कनों जैसे पैकेजिंग-डिजाइन बदलावों को अनिवार्य किया जाना चाहिए, अथवा प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के लिए वर्तमान विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (EPR) व्यवस्था को ही प्रमुख उपाय बनाए रखा जाना चाहिए।
NGT के अधिकार क्षेत्र पर सवाल
HUL की पहली प्रमुख आपत्ति यह है कि याचिका ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 14 के तहत NGT के अधिकार क्षेत्र को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी कसौटी पूरी नहीं की है। कंपनी के अनुसार, NGT तभी किसी मामले की सुनवाई कर सकता है जब उसमें पर्यावरण से जुड़ा कोई महत्वपूर्ण प्रश्न हो और वह अधिनियम की अनुसूची-I में शामिल किसी कानून के क्रियान्वयन से उत्पन्न हुआ हो।
HUL का कहना है कि याचिका में कंपनी अथवा किसी अन्य प्रतिवादी द्वारा किसी विशिष्ट पर्यावरण कानून के उल्लंघन का उदाहरण नहीं दिया गया है। इसके बजाय याचिका भविष्य के लिए टेथर्ड कैप से संबंधित एक नया उत्पाद-डिजाइन मानक लागू करने की मांग करती है।
कंपनी के मुताबिक, यह किसी मौजूदा कानूनी दायित्व के उल्लंघन का मामला नहीं बल्कि नीति और प्रत्यायोजित विधायन का विषय है। HUL ने ऑरोविल फाउंडेशन बनाम नवरोज़ केरसास्प मोदी एवं अन्य सहित सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि हर पर्यावरणीय शिकायत स्वतः NGT के समक्ष “पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न” नहीं बन जाती। इसके लिए अनुसूची-I के अंतर्गत आने वाले किसी कानून के उल्लंघन को स्पष्ट रूप से दर्शाना आवश्यक है।

HUL के विरुद्ध आरोप नहीं
कंपनी ने यह भी कहा कि याचिका में HUL के खिलाफ कोई अलग और स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। HUL के अनुसार, उसे अलग-अलग व्यापारिक क्षेत्रों वाली 16 अन्य संस्थाओं के साथ प्रतिवादी बनाया गया है, लेकिन याचिका में HUL के किसी खास उत्पाद, पैकेजिंग प्रारूप, EPR अनुपालन में कमी, सहमति शर्तों के उल्लंघन, निरीक्षण निष्कर्ष या पर्यावरणीय घटना का उल्लेख नहीं है।
HUL ने तर्क दिया कि केवल किसी कंपनी को मामले में प्रतिवादी बना देने से उसके आचरण और कथित पर्यावरणीय नुकसान के बीच आवश्यक संबंध स्थापित नहीं हो जाता। कंपनी ने अपने संदर्भ में याचिका को अस्पष्ट, आधारहीन और प्रारंभिक स्तर पर खारिज किए जाने योग्य बताया है।
जवाब में कहा गया है कि HUL का मुख्य कारोबार पैकेज्ड पेयजल, कार्बोनेटेड पेय अथवा स्टिल बेवरेज के निर्माण या विपणन पर केंद्रित नहीं है, जो याचिका में टेथर्ड कैप मांग का प्रमुख विषय हैं। हालांकि, कंपनी ने कहा कि जिन उत्पादों में प्लास्टिक पैकेजिंग का उपयोग होता है और जो प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के दायरे में आते हैं, उनके संबंध में वह CPCB के केंद्रीकृत EPR पोर्टल पर ब्रांड ओनर और आयातक के रूप में पंजीकृत है।
HUL ने अपने ब्रांड ओनर EPR पंजीकरण संख्या BO-14-000-03-AAACH1004N24 तथा आयातक EPR पंजीकरण संख्या IM-31-000-01-AAACH1004N23 बताई है। कंपनी ने दावा किया है कि उसने श्रेणी-I कठोर प्लास्टिक पैकेजिंग और अन्य लागू श्रेणियों के लिए संबंधित वित्तीय वर्षों के EPR लक्ष्य पूरे किए हैं।
MoEFCC को आवश्यक पक्षकार बताया
HUL ने मामले में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) को पक्षकार नहीं बनाए जाने पर भी आपत्ति उठाई है। कंपनी के अनुसार, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत नियमों और पैकेजिंग मानकों को बनाने, संशोधित करने या अधिसूचित करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
HUL का कहना है कि CPCB के पास पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत नियम बनाने का अधिकार नहीं है। प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में CPCB की भूमिका सलाहकारी और अनुशंसात्मक है, जबकि पैकेजिंग-डिजाइन से संबंधित किसी बाध्यकारी मानक को लागू करने या नियमों में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार, MoEFCC के माध्यम से, रखती है।
कंपनी ने कहा कि CPCB को टेथर्ड कैप लागू करने का निर्देश देने अथवा प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में संशोधन का आदेश देने के प्रश्न का प्रभावी निपटारा MoEFCC को सुने बिना नहीं किया जा सकता। HUL ने मंत्रालय को पक्षकार न बनाने को याचिका की सुनवाई-योग्यता से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कमी बताया है।
मौजूदा EPR व्यवस्था का हवाला
HUL के जवाब का मुख्य आधार प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अंतर्गत लागू EPR व्यवस्था है। कंपनी ने कहा कि प्लास्टिक बोतलें और उनके ढक्कन पहले से ही नियमों की अनुसूची-II में “श्रेणी-I: कठोर प्लास्टिक पैकेजिंग” के अंतर्गत आते हैं। इसलिए उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड ओनर्स पर इनके संग्रहण, पुनर्चक्रण और पर्यावरण अनुकूल प्रसंस्करण से संबंधित EPR दायित्व पहले से लागू हैं।
कंपनी के अनुसार, मौजूदा नियम पैकेजिंग के हर घटक के लिए डिजाइन निर्धारित करने के बजाय परिणाम-आधारित नियामकीय मॉडल अपनाते हैं। इसका उद्देश्य बाजार में डाली गई प्लास्टिक पैकेजिंग के कचरे का संग्रहण, पृथक्करण, पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
HUL ने कहा कि कैप के लिए अलग से डिजाइन अनिवार्यता का न होना नियामकीय रिक्तता नहीं है। कंपनी के मुताबिक, मौजूदा नियम उस प्लास्टिक कचरे को पहले से कवर करते हैं, जिस पर याचिका चिंता व्यक्त करती है, और कंपनियों पर EPR आधारित जिम्मेदारियां लगाते हैं।
जवाब में “प्रदूषक भुगतान सिद्धांत” का भी उल्लेख किया गया है। HUL ने कहा कि EPR व्यवस्था के माध्यम से यह सिद्धांत लागू है, क्योंकि उत्पादक, आयातक और ब्रांड ओनर बाजार में डाली गई प्लास्टिक पैकेजिंग के कचरे के संग्रहण और पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन की जिम्मेदारी उठाते हैं। नियमों की अनुसूची-II के तहत अनुपालन न होने पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति भी देय हो सकती है।
टेथर्ड कैप का नीतिगत प्रश्न
टेथर्ड कैप ऐसे ढक्कन होते हैं जो बोतल खोलने के बाद भी बोतल से जुड़े रहते हैं। इनका उद्देश्य ढक्कन के अलग से फेंके जाने अथवा कचरे में खो जाने की संभावना कम करना है। याचिकाकर्ता ने प्लास्टिक पेय बोतलों के लिए ऐसे कैप अनिवार्य करने की मांग की है।
HUL ने कहा कि ऐसी अनिवार्यता का आदेश देना भारत में एक नया उत्पाद-डिजाइन मानक तैयार करने के समान होगा, जबकि ऐसा कोई बाध्यकारी मानक वर्तमान में मौजूद नहीं है। कंपनी ने कहा कि अदालतें या न्यायाधिकरण विधायिका अथवा कार्यपालिका को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने या नियम संशोधित करने का निर्देश नहीं दे सकते।
कंपनी ने स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश एवं अन्य बनाम योगेन्द्र मोहन सेनगुप्ता एवं अन्य तथा नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ एवं अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का हवाला दिया है। इन निर्णयों में नीतिगत मामलों और कार्यपालिका की नियम-निर्माण शक्ति में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं पर विचार किया गया था।
HUL का कहना है कि भारत को नया पैकेजिंग-डिजाइन मानक अपनाना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय सक्षम नियामक प्राधिकारियों, तकनीकी विशेषज्ञों, उद्योग हितधारकों और पर्यावरणीय पहलुओं के समुचित परीक्षण के बाद होना चाहिए।
वैज्ञानिक साक्ष्य पर आपत्ति
कंपनी ने याचिका के तथ्यात्मक और वैज्ञानिक आधार पर भी सवाल उठाए हैं। HUL ने कहा कि याचिकाकर्ता ने प्लास्टिक कचरा उत्पादन, PET बोतलों की खपत, प्रति कैप प्लास्टिक वजन अथवा कूड़े में बोतल के ढक्कनों की उपस्थिति से संबंधित दावों के समर्थन में कोई अध्ययन, सर्वेक्षण, ऑडिट रिपोर्ट या तकनीकी दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं रखा है।
HUL के अनुसार, किसी पैकेजिंग-डिजाइन बदलाव का पर्यावरणीय लाभ केवल अनुमान के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए भारत की संग्रहण व्यवस्था, पुनर्चक्रण की अर्थव्यवस्था, वैकल्पिक सामग्री के प्रभाव, उपभोक्ता उपयोग व्यवहार और पूरे उत्पाद जीवन-चक्र पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन जरूरी है।
कंपनी ने कहा कि भारतीय परिस्थितियों में टेथर्ड कैप से वास्तविक शुद्ध पर्यावरणीय लाभ होगा या नहीं, यह विशेषज्ञों द्वारा जांचे जाने वाला तकनीकी प्रश्न है। HUL ने यह भी तर्क दिया कि जटिल पर्यावरणीय और वैज्ञानिक विषयों पर सामान्य आशंकाओं के बजाय विशेषज्ञ निकायों के मूल्यांकन पर भरोसा किया जाना चाहिए।
यूरोपीय मॉडल पर बहस
याचिका में यूरोपीय संघ के सिंगल-यूज प्लास्टिक ढांचे को अंतरराष्ट्रीय उदाहरण के रूप में संदर्भित किया गया है। HUL ने इस तुलना का विरोध करते हुए कहा कि यूरोपीय संघ में टेथर्ड कैप आवश्यकता लागू होने से पहले कई वर्षों की परामर्श प्रक्रिया और तकनीकी मानकीकरण हुआ था।
कंपनी का कहना है कि भारत में अभी ऐसा तुलनीय नियामकीय या तकनीकी मूल्यांकन सामने नहीं आया है। इसलिए यूरोपीय अनुभव को अपने आप यह प्रमाण नहीं माना जा सकता कि टेथर्ड कैप भारत के लिए सबसे प्रभावी समाधान है।
HUL ने सामग्री उपयोग से संबंधित चिंता भी जताई है। कंपनी के अनुसार, टेथर्ड कैप के डिजाइन में सामान्य अलग होने वाले ढक्कन की तुलना में प्रति इकाई अधिक प्लास्टिक लग सकता है। यदि इस पहलू का विश्वसनीय आकलन नहीं किया जाता, तो व्यापक अनिवार्यता से बाजार में आने वाले कुल प्लास्टिक की मात्रा बढ़ने की संभावना हो सकती है।
यह तर्क केवल कूड़े में ढक्कन की मात्रा कम करने तक सीमित नहीं है। इससे यह प्रश्न भी उठता है कि क्या ढक्कन के पर्यावरण में अलग होकर जाने की कमी, अधिक प्लास्टिक उपयोग, पैकेजिंग रीडिजाइन, रीसाइक्लिंग प्रभाव और आपूर्ति शृंखला में बदलाव के कारण होने वाले संभावित प्रभावों को संतुलित कर पाएगी।
उद्योग के सामने बदलाव लागत
HUL ने कहा कि टेथर्ड कैप पैकेजिंग को अनिवार्य बनाने से पैकेजिंग मूल्य शृंखला में बड़े तकनीकी और वित्तीय बदलाव की जरूरत पड़ सकती है। इनमें बोतलों और कैप की ज्यामिति का पुन:डिजाइन, मोल्ड और फिलिंग लाइनों में बदलाव, पैकेजिंग की कार्यक्षमता का पुन:परीक्षण, उत्पाद की गुणवत्ता और उपभोक्ता सुरक्षा का सत्यापन तथा आपूर्ति शृंखला में आवश्यक समायोजन शामिल हो सकते हैं।
कंपनी ने कहा कि याचिका में न तो समूचे उद्योग के लिए और न ही किसी व्यक्तिगत प्रतिवादी के लिए तकनीकी अथवा वित्तीय व्यवहार्यता का आकलन प्रस्तुत किया गया है।
हालांकि, HUL ने यह भी कहा है कि वह सामान्य कॉरपोरेट नीति के तहत प्लास्टिक पैकेजिंग डिजाइन और स्थिरता पर MoEFCC या CPCB द्वारा शुरू की जाने वाली किसी वैध हितधारक परामर्श प्रक्रिया, तकनीकी अध्ययन या नियामकीय प्रक्रिया में भाग लेने के लिए तैयार है।
यह रुख संकेत देता है कि HUL मौजूदा याचिका में न्यायिक रूप से डिजाइन मानक लागू करने का विरोध कर रही है, लेकिन साक्ष्य-आधारित नियामकीय प्रक्रिया के माध्यम से इस मुद्दे की जांच के लिए तैयार है।
NGT से क्या मांग की
HUL ने NGT से अनुरोध किया है कि उसके संबंध में मूल आवेदन को खारिज किया जाए। कंपनी ने खुद को मामले के पक्षकारों की सूची से हटाने और उसके विरुद्ध किसी भी दंडात्मक, बाध्यकारी या अंतरिम राहत को अस्वीकार करने की भी मांग की है।
कंपनी ने आगे आवश्यकता पड़ने पर विस्तृत पैरा-वार जवाब और अतिरिक्त दस्तावेज दाखिल करने का अधिकार भी सुरक्षित रखा है।
NGT का अंतिम रुख कंपनियों, नियामकों, कचरा प्रबंधन एजेंसियों और उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण होगा। मामला EPR-आधारित अनुपालन की सीमा, कचरा रोकथाम में उत्पाद डिजाइन की भूमिका और भारत में नए प्लास्टिक पैकेजिंग मानक तैयार करने के संस्थागत रास्ते से जुड़े प्रश्नों को सामने लाता है।
HUL का जवाब कंपनी की कानूनी दलीलों और दावों को दर्शाता है। इस जवाब के आधार पर NGT ने अभी तक याचिकाकर्ता की मांगों अथवा HUL की आपत्तियों के गुण-दोष पर कोई फैसला नहीं दिया है।
स्रोत: हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड द्वारा प्रतिवादी संख्या 2 के रूप में दाखिल जवाब, मूल आवेदन संख्या 137/2026, आकाश रैनिसन बनाम CPCB एवं अन्य, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल, प्रधान पीठ, नई दिल्ली; दिनांक 1 सितंबर 2026
कापीराइट इंडिया सीएसआर
अंग्रेजी में पढ़िएः HUL Seeks Dismissal from NGT Case Seeking Mandatory Tethered Caps on Plastic Beverage Bottles – India CSR
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