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छत्तीसगढ़ का रामनामी सम्प्रदाय – परिचय एवं विशेषताएँ

India CSR by India CSR
February 19, 2024
in Trending News
Reading Time: 3 mins read
रामनामी मेला को भजन मेला भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के किसी न किसी गांव में प्रत्येक वर्ष रामनामी मेला आयोजित होता है। यह शान्ति और सद्भावना का मेला है। गाँव का कोई व्यक्ति इस मेले को आयोजित करता है। धान की फसल कटने के बाद यह मेला आयोजित होता, इसलिए यह मेला पूरे अंचल के लोगों के लिए आकर्षण और मनोरंजन का केंद्र बनता है।
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छत्तीसगढ़ का रामनामी सम्प्रदायः छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परम्परा पर एक विशेष लेख

छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय ने राम के नाम को अपने भीतर समा लिया है। इस समुदाय के लोग राम की भक्ति में इतनी गहराई से डूबे हैं कि अपने शरीर के सभी अंगों में राम नाम का गोदना कराते हैं। अपने वस्त्रों को राम नाम से रंगते हैं। घरों की दीवारों पर राम-राम अंकित कराते हैं। एक- दूसरे का अभिवादन राम-राम कहकर करते हैं और एक-दूसरे को राम-राम नाम से ही पुकारते हैं। इनका राम हर मनुष्य में, जीव जंतु में और समस्त प्रकृति में समाया हुआ है।

रामभक्ति की ऐसी गहन परंपरा देश में अन्यत्र दुर्लभ है। रामनामी समुदाय का पूरा जीवन राम की भक्ति में लीन होता है। शरीर पर राम नाम का गोदना और सिर पर मोर पंख इनकी विशेषता है। इनका निवास उन्हीं स्थानों पर है जहां से वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम के चरण गुजरे थे।

***

रामनामी सम्प्रदाय का विस्तारः रामनामी समुदाय

इस समुदाय के लोग जांजगीर-चांपा, शिवरीनारायण, सारंगढ़, बिलासपुर के पूर्वी क्षेत्रों में विशेषकर महानदी के किनारे के क्षेत्रों में निवासरत हैं। भगवान राम वनवास के दौरान महानदी के किनारे से गुजरे थे। प्रभु राम की प्रेरणा से ही रामनामी समुदाय ने उनके जीवन चरित्र का अनुपालन किया और भक्ति में डूब गए।

अपने राम के प्रति अगाध,अथाह प्रेम और अटूट आस्था की यह गाथा हकीकत में कही विराजमान है तो वह छत्तीसगढ़ के रामनामी समुदाय ही हैं। भगवान राम के ननिहाल छत्तीसगढ़ में रामनामी समुदाय का पादुर्भाव कई उपेक्षाओं, तिरस्कारो और संघर्षों की दास्तान है, जो 160 वर्ष से अधिक समय पहले अपनी आस्था पर पहुँची चोट के साथ इस रूप में जन्मी कि आने वाले काल में इन्हें अपनाने और मानने वालों की संख्या बढ़ती चली गई। वह दौर भी आया जब रामनामी समुदाय अपनी तपस्या और सादगी को अपनी उपासना के बलबूते साबित करने में सफल हुए।

***

परम्परा एवं विश्वास

ये निर्गुण संतों की आध्यात्मिक परंपरा में रचे बसे हैं। राम अंतिम यात्रा राम नाम सत्य के साथ आगे बढ़ती है। राम नाम के उद्घोष के साथ ही पूरा शरीर राख में परिवर्तित हो जाता है। रामनामी समाज के लोग इस हाड़ मांस रूपी देह को प्रभु श्री राम की देन मानते हैं। रोम-रोम में भगवान राम की उपस्थिति मानते हैं। रामनामी न मंदिर जाते हैं और न मूर्ति पूजा करते हैं। ये निर्गुण संतों की आध्यात्मिक परंपरा में रचे बसे हैं।

शरीर पर श्वेत परिधानों के साथ मोह, माया, लोभ, काम, क्रोध और व्यसनों को त्याग कर सबको भाई-चारे के साथ बिना किसी भेदभाव के शांतिपूर्ण तरीके से जीवनयापन का संदेश भी देते हैं।

India CSR

***

शाकाहार

ये शुद्ध शाकाहारी होते हैं और नशे जैसे व्यसनों से दूर रहते हैं। हिंदू समाज की दहेज जैसी कुरीतियों से दूर इस समुदाय के अधिकांश लोग खेती करते हैं और खाली समय में राम भजन का प्रचार करते हैं।

***

मूर्ति पूजा निषेध

रामनामी न मंदिर जाते हैं और न मूर्ति पूजा करते हैं।

रामनामी समाज के लोग इस हाड़ मांस रूपी देह को प्रभु श्री राम की देन मानते हैं। रोम-रोम में भगवान राम की उपस्थिति मानते हैं। रामनामी न मंदिर जाते हैं और न मूर्ति पूजा करते हैं। ये निर्गुण संतों की आध्यात्मिक परंपरा में रचे बसे हैं।

छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय ने राम के नाम को अपने भीतर समा लिया है। इस समुदाय के लोग राम की भक्ति में इतनी गहराई से डूबे हैं कि अपने शरीर के सभी अंगों में राम नाम का गोदना कराते हैं। अपने वस्त्रों को राम नाम से रंगते हैं।

***

कुरीति से दूरी

हिंदू समाज की दहेज जैसी कुरीतियों से दूर इस समुदाय के अधिकांश लोग परम्परागत ढंग से धान आदि की खेती करते हैं और खाली समय में राम भजन का प्रचार करते हैं। रामनामी को कोई भी समाज और धर्म के लोग अपना सकते हैं,लेकिन उन्हें सदाचारी, शाकाहारी और नशे आदि से दूर रहते हुए मानवता के प्रति प्रेम को अपनाना होगा। उन्होंने यह भी बताया कि रामनामी अपने शरीर पर राम…राम लिखवाने के साथ ही कभी सिर पर केश नहीं रखते, महिला हाथों में चूड़ी या गले में माला भी नहीं पहनती।

शरीर पर राम ही राम धारण होता है और यह प्राण त्यागने के पश्चात भी मिट्टी में दफन होते तक आत्मसात रहता है।

***

रामनामी मेला या भजन मेला

रामनामी मेला को भजन मेला भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ के किसी न किसी गांव में प्रत्येक वर्ष रामनामी मेला आयोजित होता है। यह शान्ति और सद्भावना का मेला है। गाँव का कोई व्यक्ति इस मेले को आयोजित करता है। धान की फसल कटने के बाद यह मेला आयोजित होता, इसलिए यह मेला पूरे अंचल के लोगों के लिए आकर्षण और मनोरंजन का केंद्र बनता है।

***

***

1910 में ग्राम पिरदा में आयोजित किया गया था पहली बार मेला

  रामनामी बड़े भजन का मेला,संत समागम का आयोजन वर्ष 1910 से लगातार आयोजित किया जा रहा है। पौष शुक्ल पक्ष एकादशी से त्रयोदशी तक 3 दिवस चलने वाले इस मेले में भजन और 24 घण्टे राम नाम जाप किया जाता है। पैरो में घुँघरू के साथ राम..राम लय में गाते हुए नृत्य करते है और मेले की शोभा को बढ़ाते हुए रामनाम के संदेश को सभी के मन में समाहित करने कामयाब भी होते हैं।

खींचे चले आते हैं मेले में और फिर आना चाहते हैं लोग

रामनामी मेला हर साल किसी न किसी गाँव में होता आ रहा है। इस मेले में एक बार आने वाले समय मिलते ही दोबारा जरूर आते हैं। अब तक आठ बार रामनामी मेले में आ चुकी वृद्धा कचरा बाई कहती है कि मुझे यहां आकर बहुत ही खुशी की अनुभूति महसूस होती है। कौशल्या चौहान बताती है कि वह तीसरी बार इस मेले में आई है। दिल्ली से आये सरजू राम ने बताया कि वह कई मेले में शामिल हो चुका है। यह मेला सभी समाज को जोड़ने और मानवता को बढ़ावा देने के संदेश को विकसित करता है। मेला समिति के अध्यक्ष केदारनाथ खांडे ने बताया कि दूरदराज से आए ग्रामीण मेला में पूरे तीन दिन तक ठहरते भी हैं, यहाँ लगातार भंडारा भी चलता रहता है। इस दौरान राम…राम..राम की आस्था उन्हें दोबारा आने के लिए उत्सुक भी करती है।

छत्तीसगढ़ के रामनामी संप्रदाय ने राम के नाम को अपने भीतर समा लिया है। इस समुदाय के लोग राम की भक्ति में इतनी गहराई से डूबे हैं कि अपने शरीर के सभी अंगों में राम नाम का गोदना कराते हैं। अपने वस्त्रों को राम नाम से रंगते हैं।

***

जैजैपुर- कुरदी में रामनामी मेला – जनवरी 2024


वर्ष 2024 का रामनामी मेला छत्तीसगढ़ राज्य के नवगठित जिले सक्ती के जैजैपुर और मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम कुरदी में 115वाँ रामनामी मेला 21 एवं 22 जनवरी 2024 को आयोजित हुआ। यहाँ दिनभर लगातार राम-राम-राम की गूंज होती रही।

रामनामी समुदाय से जुड़े लोग भजन-कीर्तन और रामायण का जाप करते हुए भगवान राम के संदेश को प्रेम और सदभाव से सबके जीवन में उतार रहे थे। इस दौरान हजारो लोगों ने रामनामी आस्था के प्रतीक जैतखाम का दर्शन और यहाँ पूजा कर सुख-समृद्धि की मनोकामना की।

रामनामियों द्वारा आयोजित बड़े भजन मेला और संत समागम में बड़ी संख्या में आसपास सहित दूरदराज के लोगों ने अपनी मौजूदगी दी। जैजैपुर सहित कुरदी में राम-राम का उल्लास और उत्साह आने वालों में बना रहा। रामनामियों द्वारा अपने प्रभु राम को अपने विशेष अंदाज में पूजा। राम-राम-राम लिखे वस्त्रों को धारण कर, सिर पर मोरपंख के साथ मुकुट पहनकर वे आस्था के बहुत गहराइयों में डूबे हुए नजर आए।

गाँव के ही दंपति द्वारा दान भूमि में बनाया गया है छतदार जैतखाम

भगवान राम के लिए अपनी जीवन समर्पित करने वाले रामनामी समुदाय का यह मेला वास्तव में समाज को जोड़ने और मानवता को विकसित करने वाला होता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि गाँव के अनेक लोग जो अन्य समाज के है उन्होंने अपनी कीमती भूमि छतदार जैतखाम के निर्माण के लिए दान की। गांव के पंचराम चंद्रा और श्रीमती लकेश्वरी चंद्रा ने मेला स्थल पर भूमि दान की है वहीं अन्य ग्रामीण भी है, जिन्होंने निःस्वार्थ अपनी कीमती जमीन दान की है।

गाँव के ही दंपति द्वारा दान भूमि में बनाया गया है छतदार जैतखाम

भगवान राम के लिए अपनी जीवन समर्पित करने वाले रामनामी समुदाय का यह मेला वास्तव में समाज को जोड़ने और मानवता को विकसित करने वाला होता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि गाँव के अनेक लोग जो अन्य समाज के है उन्होंने अपनी कीमती भूमि छतदार जैतखाम के निर्माण के लिए दान की। गांव के पंचराम चंद्रा और श्रीमती लकेश्वरी चंद्रा ने मेला स्थल पर भूमि दान की है वहीं अन्य ग्रामीण भी है,जिन्होंने निःस्वार्थ अपनी कीमती जमीन दान की है।

1910 में ग्राम पिरदा में आयोजित किया गया था पहली बार मेला

  रामनामी बड़े भजन का मेला,संत समागम का आयोजन वर्ष 1910 से लगातार आयोजित किया जा रहा है। पौष शुक्ल पक्ष एकादशी से त्रयोदशी तक 3 दिवस चलने वाले इस मेले में भजन और 24 घण्टे राम नाम जाप किया जाता है। पैरो में घुँघरू के साथ राम..राम लय में गाते हुए नृत्य करते है और मेले की शोभा को बढ़ाते हुए रामनाम के संदेश को सभी के मन में समाहित करने कामयाब भी होते हैं।

रामनामी गुलाराम ने बताया कि हमारा यहीं संदेश है कि लोग आपस में मिलजुलकर रहे, आपस में प्रेम करे और इंसानों के बीच जो दूरियां जात-पात के नाम पर है, वह मिटे।

उन्होंने कहा कि हमने और हमारे पीढ़ियों ने राम को जीवन में उतार लिया है। मेले में आए दादू राम ने बताया कि वे सपरिवार यहाँ आए हैं, यहाँ विशेष सुख की अनुभूति होती है। रामनामियों को इस रूप में देख के लगता है कि ये कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है बल्कि प्रभु राम के दूत है।

कोरबा से आये प्रकाश दास का कहना है कि किसी के शरीर पर जब कोई छोटा सा दाग लग जाता है तो उन्हें मिटाने के लिए तरह-तरह की दवाइयां लगाते हैं, कोई प्लास्टिक सर्जरी तक कराता है, लेकिन यहाँ इन्होंने अपने शरीर में दर्द को सहकर भी आजीवन राम-राम लिखवाया है। यह कोई छोटी सी बात नहीं है, यह तो राम के सबसे बड़े भक्त और उन्हें मानने वाले ही कर सकते हैं। उनका कहना है कि लोगों को रामनामियों का दर्शन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इनके दर्शन मात्र से ही सच्चाई का बोध होता है और राम-राम के प्रति मन में आस्थाओं की दीप जलती है।

ग्राम मोहतरा के वृद्ध खोलबहरा ने अपने माथे में राम-राम लिखवाया है। उन्होंने बताया कि कुरदी में रामनामी मेला की जानकारी मिलते ही वे रामनामियों के दर्शन के लिए आए है। पाँच बार रामायण का पाठ कर चुके खोलबहरा बताते है कि यह शान्ति और सद्भावना का मेला है। यहाँ आने के बाद रामनामियों का जीवन आपको प्रेरणा देगा। मेले के दूसरे दिन बड़ी संख्या में बच्चे, महिलाएँ सहित युवाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। मेले में व्यंजनों के स्टॉल, झूले, जरूरतों के सामान से सजी दुकानों और मनोरंजन के साधनों पर भी भारी भीड़ रही। मेला आने से पहले उत्साह में समाए लोग एक यादगार लम्हों के साथ मेले का आनंद लेते रहे।

छोटे लेंधरा के लोहराभांठा में रामनामी भजन मेला का शुभारंभ

21 जनवरी 2024 को रामनामी भजन मेला का आयोजन सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला के अंतर्गत सारंगढ़ से कोसीर रोड में छोटे लेंधरा के लोहराभांठा में आयोजित किया गया। रामनामी समुदाय के श्रद्धालुओं ने कलश और ध्वज के साथ भजन मेला गर्भ गृह के चारो ओर “राम राम” के भजन कीर्तन से परिक्रमा कर स्थल में कलश को स्थापित किया।

इसके साथ ही साथ मध्य और चारो खंभे में राम राम का ध्वज बांधा गया। भजन मेला में पुलिस और स्वास्थ्य आयुष विभाग का स्टाल लगाया गया, जहां आयुर्वेद अधिकारी डॉ बी आर पटेल द्वारा चिकित्सा सेवा प्रदान किया गया। उल्लेखनीय है कि समुदाय के आपसी बंटवारा अनुसार यह भजन मेला कार्यक्रम सक्ति जिले में भी आयोजित किया गया, जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है।

(इंडिया सीएसआर)

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