वृक्षारोपण के नाम पर चलाए जा रहे अभियान, जैसे वन महोत्सव, पर्यावरण संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इनका दुरुपयोग भ्रष्टाचार के लिए एक सरकारी उपकरण के रूप में हो रहा है।
हर साल भारत में वन महोत्सव के नाम पर करोड़ों पेड़ लगाने के दावे किए जाते हैं। जैसे ही बारिश का महीना शुरू होता है हमारे देश की सभी राज्य सरकारें, जैसे छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, तेलंगाना, उत्तराखंड, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण अभियान चलाती हैं। इसके द्वारा लाखों-करोड़ों पौधे रोपने का वादा और दावा किया जाता है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने हाल ही में ‘वना महोत्सव’ के तहत 18.03 करोड़ पौधे लगाने की घोषणा की। लेकिन इन भव्य दावों के पीछे की हकीकत अक्सर निराशाजनक होती है। ये अभियान वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के बजाय संगठित भ्रष्टाचार करने के लिए किए जाते हैं।
खोखले दावों और वास्तविकता का अंतर
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल वन महोत्सव के दौरान लाखों-करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं। अगर इन दावों को सच मान लिया जाए, तो भारत का वन क्षेत्र इतना बढ़ चुका होता कि अब नए पेड़ लगाने की जगह ही न बचे। वन रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत का वन क्षेत्र कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25% है, जो सकारात्मक लगता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह आंकड़ा वन स्वास्थ्य और प्रबंधन की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाता। कई बार पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल नहीं की जाती, जिससे अधिकांश पौधे सूख जाते हैं। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय में सबबूल और यूकेलिप्टस जैसे पेड़ों को हटाकर नए पौधे लगाने की बात कही गई, लेकिन छात्रों ने आरोप लगाया कि पर्यावरण के लिए हानिकारक पेड़ों को हटाने के नाम पर पुराने पेड़ काटे गए। यह सवाल उठाता है कि क्या ये अभियान वास्तव में पर्यावरण संरक्षण के लिए हैं या केवल दिखावे के लिए?
वृक्षारोपण- हरियाली का भ्रष्टाचार
वृक्षारोपण अभियानों में भ्रष्टाचार के कई रूप सामने आए हैं। उत्तराखंड में एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वन विभाग ने 10 रुपये की कीमत वाले पौधों को 100 रुपये में खरीदा, जिससे सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के बावन ब्लॉक की ग्राम ऐजा में वृक्षारोपण के नाम पर हजारों रुपये का घपला होने की बात सामने आई है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि वृक्षारोपण के लिए आवंटित धन का एक बड़ा हिस्सा गलत तरीके से उपयोग किया जाता है। पौधों की खरीद में कीमतों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना, निम्न गुणवत्ता वाले पौधों का उपयोग, और रोपण के बाद देखभाल की कमी जैसे मुद्दे आम हैं।
इसके अलावा, कई बार वृक्षारोपण के लिए अनुपयुक्त स्थानों, जैसे घास के मैदानों, को चुना जाता है, जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाता है। मोनोकल्चर (एकल प्रजाति के पेड़) को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति भी जैव विविधता को खतरे में डालती है। यह सब सरकारी मशीनरी और ठेकेदारों के बीच सांठगांठ का परिणाम प्रतीत होता है, जहां पर्यावरण संरक्षण केवल एक बहाना है।
छत्तीसगढ़ का 140 करोड़ वृक्षारोपण लक्ष्य सवालों के घेरे में
🌳 छत्तीसगढ़ सरकार का दावा और महत्त्वाकांक्षा
8 जुलाई 2024 को छत्तीसगढ़ सरकार ने बड़े गर्व के साथ यह घोषणा की थी कि वह मार्च 2025 तक 140 करोड़ वृक्षों का रोपण करेगी। सरकार ने इसे देश का सबसे बड़ा वृक्षारोपण अभियान बताया और ‘एक पेड़ मां के नाम’ महावृक्षारोपण अभियान के तहत वन एवं वनेत्तर क्षेत्रों में 3.85 करोड़ पौधों के रोपण की योजना घोषित की थी। मुख्य उद्देश्य था – पर्यावरण संतुलन बनाए रखना और छत्तीसगढ़ को हराभरा बनाना।
छत्तीसगढ़ बनने के बाद अगर अब तक किए गए वृक्षारोपण में से आधे पेड़ भी जिंदा रहते, तो आज पूरा प्रदेश हरा-भरा होता। (छत्तीसगढ़ में वृक्षारोपण अभियान विफल) लेकिन इसके विपरीत, प्रदेश का वन क्षेत्र लगभग 3 प्रतिशत तक घट गया है।
सरकार का यह भी दावा था कि सितंबर 2024 तक देश भर में 80 करोड़ और मार्च 2025 तक 140 करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ लगाने के बाद भी आम लोगों ने न तो कहीं नए जंगल देखे, न ही हरियाली में कोई वास्तविक बढ़ोतरी।
🔍 यथार्थ क्या है?
मार्च 2025 बीत चुका है। यदि सरकार के दावे सही होते, तो आज छत्तीसगढ़ की हर बंजर ज़मीन पर हरियाली होती, हर सड़क के किनारे पेड़ों की कतारें होतीं और हर गांव के आसपास छोटे-बड़े जंगल तैयार हो गए होते।
लेकिन आज छत्तीसगढ़ की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है:
- गर्मियों में तापमान लगातार बढ़ रहा है।
- जंगल कट रहे हैं, नए जंगल बन नहीं रहे।
- शहरीकरण और खनन के कारण हरियाली खत्म हो रही है।
- वन विभाग, कृषि विभाग या ग्रामीण विकास विभाग ने कोई सार्वजनिक रिपोर्ट जारी नहीं की कि कहाँ कितने पौधे लगाए गए और उनमें से कितने जीवित हैं।
❓ महत्वपूर्ण सवाल
- क्या सरकार ने यह रिपोर्ट जारी की है कि 140 करोड़ पौधे कहाँ लगाए गए?
- नहीं। अब तक कोई विस्तृत, प्रामाणिक और सार्वजनिक रिपोर्ट सामने नहीं आई है।
- क्या इन पौधों के जिंदा रहने की गणना हुई है?
- वृक्षारोपण के बाद पौधों की देखभाल, सिंचाई, सुरक्षा आदि के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। अधिकांश वृक्षारोपण योजनाओं में पौधों का 50% से अधिक मर जाना आम है।
- क्या स्थानीय लोगों ने वृक्षारोपण होते देखा है?
- कई ग्रामीणों और स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि पेड़ तो लगाए ही नहीं गए। कुछ जगह सिर्फ गड्ढे खोदकर फोटो खिंचवा लिए गए।
- क्या मीडिया और विपक्ष ने सवाल उठाए?
- विपक्ष ने इस अभियान को “कागजी योजना” कहा और मीडिया रिपोर्ट्स में भी इस पर सवाल उठाए गए कि इतनी बड़ी परियोजना के परिणाम जमीन पर क्यों नहीं दिख रहे।
⚠️ आशंका: भ्रष्टाचार और कागजी खानापूर्ति
इतनी बड़ी परियोजना में भ्रष्टाचार की गुंजाइश से इंकार नहीं किया जा सकता। आशंका यह भी है कि:
कागजों में पौधे गिने गए, लेकिन जमीन पर नहीं।
पौधों की खरीदी, गड्ढों की खुदाई, सिंचाई, देखरेख आदि के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च दिखाए गए।
ग्राम पंचायतों और वन समितियों को बिना जांच के फंड जारी कर दिया गया।
— छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य से महाजेंको तक जंगलों का शोषण और पर्यावरण का सरकारी छलावा
🌳 “एक पेड़ मां के नाम”: जब मां के जंगल उजाड़े जाते हैं और दिखावे के लिए पेड़ लगाए जाते हैं
छत्तीसगढ़ में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान शुरू करते हुए सरकार ने वादा किया कि हर व्यक्ति अपनी मां के नाम पर एक पेड़ लगाएगा और राज्य को हराभरा बनाएगा। लेकिन सवाल यह है कि जिन जंगलों को मां की गोद कहा जाता था, जिन वनों में हजारों साल पुरानी हरियाली थी, उन्हीं जंगलों को विकास के नाम पर उजाड़ दिया गया।
सरकार और उद्योगों ने मिलकर हसदेव अरण्य जैसे प्राचीन वनों, जो छत्तीसगढ़ के फेफड़े माने जाते हैं, को कोयला खनन के लिए खत्म कर दिया। और अब रायगढ़ जिले के गारे-पेलमा सेक्टर में अडानी समूह द्वारा महाजेंको (महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी) के लिए कोयला निकालने के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं।
🌲 हसदेव अरण्य: छत्तीसगढ़ की आत्मा, जो घायल कर दी गई
हसदेव अरण्य केवल जंगल नहीं है, वह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिस्थितिक विरासत है। यहाँ:
- हजारों साल पुराने सागौन, साल, महुआ, हर्रा, बेहड़ा के जंगल हैं।
- बायसन, हाथी, तेंदुआ जैसे दुर्लभ वन्य जीवों का आवास है।
- कोयला खनन के लिए इस क्षेत्र के लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं, और हजारों हेक्टेयर भूमि खोखली हो चुकी है।
यहाँ के स्थानीय आदिवासी इसे “धरती मां” की संज्ञा देते हैं। लेकिन इन्हीं आदिवासियों की अनुमति के बिना सरकार और कंपनियों ने खनन कार्य शुरू कर दिया।
🚜 अडानी – महाजेंको का कोयला प्रोजेक्ट: पेड़ों का क़त्ल
रायगढ़ के गारे पेलमा सेक्टर II में महाजेंको के लिए कोयला निकालने का काम अडानी एंटरप्राइजेज के हवाले है। केवल दो दिनों में 26 और 27 जून 2025 को 10,000 से अधिक पेड़ बेरहमी से काट दिए गए। कुल 214 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि को साफ किया जा रहा है। यह कार्य ‘एक पेड़ मां के नाम’ के ठीक पहले और उसी दौरान किया गया, जब सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही थी।
यह कैसा विरोधाभास है? एक तरफ पेड़ लगाओ और दूसरी तरफ लाखों पेड़ काट दो?
❓ क्या मां के नाम पर यह जंगल कटाई सही है?
क्या मां के नाम पर एक पौधा लगाना और फिर उसी मां के आंगन के जंगलों को उजाड़ देना न्यायसंगत है?
क्या यह केवल दिखावा नहीं है?
- खनन कंपनियाँ मुनाफा कमा रही हैं।
- बिजली दूसरे राज्यों को जा रही है।
- और छत्तीसगढ़ के जंगल खत्म हो रहे हैं, जल स्रोत सूख रहे हैं, और पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है।
📉 कागज़ पर वृक्षारोपण, ज़मीन पर विनाश
‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान का उद्देश्य अच्छा है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि में जो घटनाएँ घट रही हैं, वह इसे केवल “कागज़ी हरियाली” बना देती हैं।
- हसदेव अरण्य में आदिवासियों के विरोध को नजरअंदाज कर दिया गया।
- गारे पेलमा में पेड़ काटे जाने के विरोध में किसी पर्यावरणीय आकलन को सार्वजनिक नहीं किया गया।
- सरकार और कंपनियाँ मिलकर केवल उद्योगों का पेट भर रही हैं, धरती मां का नहीं।

तेलंगाना – वन महोत्सव या हरा-भरा भ्रष्टाचार?
पेड़ों की कटाई के बाद वृक्षारोपण का दिखावा, क्या यह पर्यावरण संरक्षण है या सरकारी ढोंग?
हैदराबाद से आई नई खबरें कई सवाल खड़ी करती हैं।
7 जुलाई 2025 को जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने ‘वना महोत्सव’ के तहत 18.03 करोड़ पौधे लगाने का भव्य लक्ष्य घोषित किया, तो यह सुनकर पर्यावरण प्रेमियों को संतोष होना चाहिए था। लेकिन जब इस कार्यक्रम की जड़ में झांका गया तो असलियत कुछ और ही निकली।
जहां एक तरफ मुख्यमंत्री ने लोगों से हर घर में दो पौधे लगाने और महिलाओं से पेड़ों की देखभाल करने की अपील की, वहीं दूसरी ओर उसी विश्वविद्यालय परिसर में सैकड़ों पुराने पेड़ काट दिए गए, जहां वना महोत्सव का उद्घाटन हुआ।
पुराने पेड़ों की बलि देकर नए पौधों का दिखावा
प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय (PJTAU) के 150 एकड़ परिसर में पहले से खड़े पेड़ — जिनमें Subabul और Eucalyptus जैसे प्रजातियों के पेड़ थे — उन्हें “हानिकारक” बता कर हटाया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे “पर्यावरणीय संतुलन” के नाम पर एक औपचारिक नीलामी प्रक्रिया के तहत काटा।
प्रश्न यह है कि यदि पर्यावरण के लिए सही पौधे लगाने थे तो क्या पहले से लगे पेड़ हटाने की इतनी हड़बड़ी थी? क्या पर्यावरणीय दृष्टिकोण से यह फैसला वैज्ञानिक था या सिर्फ नई परियोजनाओं के नाम पर पुरानी हरियाली की बलि चढ़ाई गई?
💸 कहीं यह भी एक नया भ्रष्टाचार मॉडल तो नहीं?
यह पहली बार नहीं हो रहा है जब कि वृक्षारोपण कार्यक्रमों में पेड़ लगाने से ज्यादा पेड़ काटने और बजट खर्च करने पर ध्यान दिया गया है।
- पुराने पेड़ों को काटकर नई पौध लगाना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दोहरा लाभ उठाया जाता है:
- लकड़ी बेचने से आय होती है।
- नए पौधों की खरीद, रोपण, रखरखाव और प्रचार-प्रसार के लिए नया फंड पास होता है।
पहले काटो, जंगल बरबाद करो, फिर पेड़ लगाओ — तीनों कामों में सरकारी खर्च, टेंडर, कमीशन और घोटाले का अवसर।
✳️ कथित गड़बड़ियाँ
- मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले में ग्राम पंचायत मुढ़िया खुर्द के वार्षिक वृक्षारोपण कार्यक्रम में ₹11 लाख की धनराशि के बावजूद, लगभग 625 पौधे नहीं रोपे गए – गड्ढे खोदे गए, लेकिन पौधरोपण नहीं हुआ; सरपंच, सचिव और रोजगार सहायक पर सरकारी पैसे हड़पने का आरोप लगा है।
- उत्तर प्रदेश के शामली क्षेत्र में लगभग 15 लाख पौधे सूख गए, जिसके पीछे निराई‑गुड़ाई और सिंचाई के लिए जारी बजट Rs. 57 लाख और Rs. 9 लाख स्रोतों का कथित दुरुपयोग बताया जा रहा है।
- छत्तीसगढ़ व महाराष्ट्र जैसे राज्यों में बड़े सरकारी वृक्षारोपण प्रोजेक्ट्स में भी नकली रिपोर्ट, पौधों का अभाव, और फंड के गड़बड़ी से जुड़ी जांच शुरू हुई हैं।
- उड़ीसा के जिपटना (कालाहांडी) वन डिविजन में पाँच वन विभाग के कर्मचारियों को Rs. 80 लाख के घोटाले में गिरफ्तार किया गया; आरोप था नकली पौधरोपण करके फंड उगाही का।
🌍 क्या वास्तव में पर्यावरण बचाने का यही तरीका है?
पर्यावरण संरक्षण का सही रास्ता होता है:
- पहले से मौजूद हरित संपदा को बचाना।
- जिन पेड़ों से सच में नुकसान है, केवल उन्हें वैज्ञानिक आधार पर हटाना।
- वृक्षारोपण के साथ-साथ पुराने पेड़ों की देखभाल और संरक्षण पर ध्यान देना।
लेकिन यहां तो पुराने पेड़ हटाने की जल्दबाजी दिखाई दी, ताकि नई योजना के नाम पर मीडिया में सुर्खियाँ बटोरी जा सकें और फंड के उपयोग में पारदर्शिता ना रहे।
सामुदायिक भागीदारी की कमी
वृक्षारोपण अभियानों की एक बड़ी कमी सामुदायिक भागीदारी का अभाव है। तेलंगाना में मुख्यमंत्री ने महिलाओं से पौधों की देखभाल करने की अपील की, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या स्थानीय समुदायों को वास्तव में इन अभियानों में शामिल किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना सामुदायिक भागीदारी के वृक्षारोपण अभियान लंबे समय तक सफल नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए, वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 के तहत वनवासियों को वन प्रबंधन में शामिल करने की बात कही गई, लेकिन कई राज्यों में इसके प्रावधानों का पालन नहीं किया जाता। मध्य प्रदेश में निजी भूमि पर वृक्षारोपण को बढ़ावा देने की योजना है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या किसानों को इसके लिए पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
नीतिगत विरोधाभास और कानूनी कमियां
वृक्षारोपण और वन संरक्षण से संबंधित नीतियों में विरोधाभास भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण के लिए, प्रतिपूरक वनीकरण निधि (कम्पेन्सेटरी अफॉरेस्टेशन फण्ड) का उपयोग कई बार वनवासियों की भूमि पर बिना उनकी सहमति के वृक्षारोपण के लिए किया जाता है, जिससे भूमि विवाद बढ़ते हैं। 2008 और 2017 के बीच वनवासियों और सरकार के बीच 154 नए भूमि विवाद दर्ज किए गए, जिनमें से 45-52% विरोधाभासी संरक्षण नीतियों के कारण थे। यह दर्शाता है कि नीतिगत अस्पष्टता और गलत कार्यान्वयन भ्रष्टाचार के लिए अनुकूल माहौल बनाते हैं।
समाधान की दिशा में
वृक्षारोपण अभियानों को भ्रष्टाचार से मुक्त करने और वास्तविक पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ कदम उठाए जा सकते हैं:
- पारदर्शिता और जवाबदेही: वृक्षारोपण के लिए आवंटित धन के उपयोग की निगरानी के लिए स्वतंत्र ऑडिट और ऑनलाइन पोर्टल बनाए जाएं।
- सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों, विशेषकर वनवासियों और आदिवासियों, को वृक्षारोपण और प्रबंधन में शामिल किया जाए।
- स्थानीय प्रजातियों का उपयोग: मोनोकल्चर के बजाय स्थानीय और जैव विविधता को बढ़ावा देने वाली प्रजातियों का चयन किया जाए।
- देखभाल और निगरानी: पौधों की रोपाई के बाद उनकी नियमित देखभाल और जीवित रहने की दर की निगरानी के लिए तकनीक, जैसे भू-स्थानिक उपकरण, का उपयोग किया जाए।
- कानूनी सुधार: वन अधिकार अधिनियम और प्रतिपूरक वनीकरण निधि जैसे कानूनों में स्पष्टता लाई जाए ताकि विरोधाभास कम हों।
(इंडिया सीएसआर)